Nemal Bata Bruksh ko Katna-Kya Yaha Bharat ki Sanskruti Par Suniyojit Prahar Hai?

 Nemal Bata Bruksh ko Katna-Kya Yaha Bharat ki Sanskruti Par Suniyojit Prahar Hai?

नेमा बट का कटना: एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आपदा

जय जगन्नाथ। जय पंचसखा। जय श्री अच्युत।

"जब नेमा बट शाखाओं से निकलने वाली जटाएं गादी को छुएगा, तब युगांत की शुरुआत होगी।"

— यह भविष्य मालिका की वह भविष्यवाणी है, जो ओडिशा के करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदय में बसी हुई थी। लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि वह भविष्यवाणी साकार हो रही है। नेमाल में स्थित प्राचीन और पवित्र नेमा बट वृक्ष, जो महापुरुष अच्युतानंद दास जी से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ था, उसे नवीकरण और सौंदर्यीकरण के नाम पर काट दिया गया।ओडिशा का लोग उसको नेमल बट,बट गोसाइँ , नेमाल गादी , गादी गोसाइँ , पद्म बन , अच्युतानंद पीठ , अच्युतानंद गादी,उत्कल का गुप्त बृन्दाबन  और नित्य नीलाचल  नामपे बोलते हैं | बही बट बृक्ष को देखने के लिए बहुत दूर से,देश और देश के बाहरसे लोग आते हैं,अपना मनस्कामना पूर्ति के लिए  बृक्ष्य पे धागा और कपडे बांधते हैं,दिप जलाते हैं | जब ए प्रतिक सबको ख़तम कर दिए जाएगा तो लोग किसीको देखने आएंगे |



नेमाल बटवृक्ष का कटना: केवल एक पेड़ नहीं, एक युग का अंत ,नेमाल का पवित्र वटवृक्ष केवल एक वृक्ष नहीं था, वह एक जीवित शक्ति, एक आध्यात्मिक धरोहर, और हमारे संस्कृतिक आत्मा का प्रतीक था। उसका कट जाना कोई सामान्य घटना नहीं है — यह एक महाअशुभ संकेत है, एक युग की समाप्ति की चेतावनी। यह ओडिशा की सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता के जीवित प्रतीक का विनाश है। और इसके आध्यात्मिक व सामाजिक परिणाम हमारी कल्पना से कहीं अधिक भयावह हो सकते हैं।आज के समस्या ये है की लोग आध्यात्मिक महतो को नहीं समझते हैं इसीलिए ऐसा काम करते हैं  |  आइए इसके बारेमे आलोचना करेंगे और जानेंगे किउं ऐसा हो रहाहे और उसका समाधान क्या है |

✍️ भूमिका:

भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है। और संस्कृति केवल किताबों, मंदिरों, या भाषणों में नहीं बल्कि उन पवित्र स्थलों, संतों की साधना भूमि और जीवंत प्रतीकों में जीवित रहती है।
नेमाल का 'बट वृक्ष' (Nemala Bata) ऐसा ही एक प्रतीक था – जहाँ संत अच्युतानंद दास जी ने अपने दिव्य ज्ञान, भविष्यवाणियाँ और साधना के माध्यम से हजारों लोगों को अध्यात्म से जोड़ा।

लेकिन आज वही पवित्र वटवृक्ष नवीनता और विकास के नाम पर काट दिया गया है। यह केवल एक पेड़ की हत्या नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना की हत्या है। बर्तमान का समस्या यही है की लोग उस आध्यत्मिक सांस्कृतिक चेतना को समझ नहीं पा रहे हैं  | 

🌳 नेमाल का दूसरा पवित्र वृक्ष – बकुल बट (Bakul Bata)

नेमाल (या नेमाला), उड़ीसा की वह पवित्र भूमि है जहाँ महापुरुष अच्युतानंद दास जी ने अपने अलौकिक जीवन का अधिकतम समय व्यतीत किया। जिस प्रकार नीम का बट (Nema Bata) इस धरती की आध्यात्मिक पहचान है, उसी प्रकार बकुल बट (Bakul Bata) इस क्षेत्र का दूसरा अत्यंत पूजनीय और रहस्यमय वृक्ष माना जाता है।

🌼 बकुल बट का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व:

  1. परमशांति और तप की भूमि:
    लोकमान्य विश्वास है कि अच्युतानंद दास जी स्वयं इस वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान, जप और अपने शिष्यों को आध्यात्मिक उपदेश दिया करते थे। बकुल वृक्ष की छांव में बैठना आज भी परमशांति और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। उस बकुल बट को गरुड़ बट भी बोलते हैं  किउं की  उसका साखाए ऐसी है की गरुड़ जैसा दीखता है | और उसके निचे ध्यान में बैठ कर पंच सखाए  राहास दीखते  थे | 

  2. सुगंधित फूलों वाला वृक्ष – आत्मा को छू जाने वाली खुशबू:
    बकुल के फूल अपनी दिव्य सुगंध के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसी मान्यता है कि इन फूलों की सुगंध आत्मा को निर्मल करती है और मन को भगवत भक्ति की ओर आकर्षित करती है। नेमाल में इस वृक्ष के नीचे बैठना आत्मिक अनुभव के समान माना जाता है। |

  3. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर:
    यह वृक्ष केवल एक पौधा नहीं, नेमाल की आध्यात्मिक सभ्यता का जीता-जागता साक्ष्य था । यहाँ  भी कीर्तन, सत्संग, ओडिया और संस्कृत श्लोकों का पाठ होता था । यह स्थल धर्म और भक्ति का जीवंत केंद्र था । अच्युतानंद जी स्वयं एक ग्रन्थ में लिखे है जो मेरा बकुल बट को परिक्रमा करके कुछ मानस करेगा बो खाली हात नहीं लौटेगा जरूर उसका मनोसकामना पूरी होगा 

  4. रहस्यमयी ऊर्जा का केन्द्र:
    स्थानीय संतों और श्रद्धालुओं का मानना है कि बकुल बट के नीचे बैठकर  भी दिव्य अनुभूति की जा सकती है। यह वृक्ष एक प्रकार का ऊर्जा केन्द्र था  जहाँ ध्यान करने से विशेष अनुभूति होत। था 

  5. स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक महत्व:
    बकुल वृक्ष केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि औषधीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत लाभकारी था । इसकी छाल, पत्तियाँ और फूल कई आयुर्वेदिक उपचारों में उपयोग होते हैं। माना जाता है कि इसके नीचे बैठने से मानसिक तनाव कम होता है।


नेमा बट का आध्यात्मिक महत्व

नेमाल बट केवल एक वृक्ष नहीं था। वह दिव्य घटनाओं का साक्षी था।

महापुरुष अच्युतानंद दास जी, जो पंचसखा संतों में से एक थे, उन्होंने इसी वृक्ष के नीचे साधना की, शिक्षाएं दीं और भविष्यवाणियाँ लिखीं।
उनकी एक पवित्र संहिता बट संहिता में उल्लेख है कि
जो कोई इस पवित्र वट वृक्ष के नीचे दीप प्रज्वलित करेगा, उसे महापुरुष की कृपा प्राप्त होगी।

यह स्थान कृपा, पूजा और आत्म-साक्षात्कार का केंद्र था। इस तरह के दिव्य स्थल को नष्ट करना केवल अपमान नहीं, एक आध्यात्मिक अपराध है।

📿 "Nemala Bata" का महत्व – केवल ओडिशा नहीं, पूरे भारत और  बिश्ब के लिए महत्तोपूर्ण था |

  • यही वह वृक्ष है जिसके नीच' संत अच्युतानंद जी ने “मालिका” जैसी भविष्यवाणियाँ लिखीं।

  • यही वह वृक्ष है जिसे हज़ारों श्रद्धालु हर साल परिक्रमा करते थे।

  • यही वह वृक्ष था जिसके नीचे बैठकर लोगों को आत्मिक शांति मिलती थी।

इस पेड़ को काटना सिर्फ एक धार्मिक स्थल पर चोट नहीं, बल्कि पंचसखा परंपरा पर

🛑 ये सिर्फ पेड़ नहीं, प्रतीक होते हैं:

  • जैसे अक्षय वट प्रयागराज में है

  • जैसे वट सावित्री व्रत भारत में होता है

  • वैसे ही Nema Bata संत-शक्ति और शाश्वत संस्कृति का प्रतीक था।



भविष्यवाणियाँ और चेतावनियाँ

भविष्य मालिका और बट संहिता दोनों में चेतावनी दी गई है कि यदि इस वृक्ष को कभी हानि पहुँचाई गई, तो यह युग के अंत का संकेत होगा — जिसके बाद प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध, महामारी और सामाजिक विघटन शुरू होंगे।

"जो बट वृक्ष के नीचे दीप जलाएगा, उसकी कोई मनोकामना अधूरी नहीं रहेगी।"

"लेकिन यदि इस वृक्ष को काटा गया, तो दुर्भिक्ष, महामारी और विनाश निश्चित है।"

क्या यह संयोग है कि आज ओडिशा सहित देश भर में बाढ़, सूखा, सामाजिक तनाव और दुर्भाग्य की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं?


🔥 क्या यह मात्र संयोग है? या सुनियोजित प्रहार?

इतिहास गवाह है –

  • ब्रिटिशों ने हमारे गुरुकुलों, ग्रंथों और परंपराओं को नष्ट करने के लिए योजनाएँ बनाईं।

  • मुगलों ने मंदिरों को तोड़ा, धर्मगुरुओं को मारा, और जबरन धर्मांतरण किए।

आज वही काम कुछ "आधुनिकता के नकाब में छिपे देशद्रोही और धर्मद्रोही" कर रहे हैं।
वे कहते हैं – “यह तो एक पुराना पेड़ था, सुरक्षा के लिए काट दिया गया।”

क्या वे नहीं जानते कि यह वृक्ष किसी जंगल का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह 'भारत की आध्यात्मिक विरासत' का जीवित प्रतीक था?


⚔️ क्या यह कार्य “संस्कृति विरोधियों” की मिलीभगत से हुआ?

ऐसे कई प्रश्न आज उठते हैं:

  • क्या यह कार्य कुछ अंधाधार्मिक एजेंडा से प्रेरित था?

  • क्या इसके पीछे कुछ धर्म-परिवर्तन लॉबी, या भारत-विरोधी ताकतें छिपी हैं?

  • क्या कुछ स्थानीय प्रशासनिक लोग इन विदेशी मानसिकता वालों के इशारे पर काम कर रहे हैं?

जब इतिहास मिटाया जाता है, तो भविष्य की पीढ़ियाँ अंधकार में जन्म लेती हैं।
"Nema Bata" का कटना केवल एक घटना नहीं, एक चेतावनी है।

सांस्कृतिक विनाश की एक शृंखला

इतिहास गवाह है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों को बार-बार काटने की कोशिश की गई — चाहे वह विदेशी आक्रांता रहे हों, ब्रिटिश उपनिवेशवादी, या आज के अंदरूनी धर्मद्रोही, जो आधुनिकीकरण के नाम पर पवित्र धरोहरों को मिटा रहे हैं।

जब मंदिरों की जगह मॉल बनते हैं, जब वटवृक्षों की जगह पार्किंग बनाई जाती है, और जब पूजा को अंधविश्वास कहकर खारिज किया जाता है —
तो यह विकास नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पतन है। 

खबर के मुताबिक  नबीकरण के लिए जो नक्सा approval हुआ था  इसमे मंदिर का  छात के ऊपर एक होल था जिसमें  मालूम पड़ता है की बृक्ष को बिना क्षति  पहुंचते हुए  मंदिर निर्माण करना था | नबीकरण प्रकल्प पहले सरकारी कार्यकर्ता और स्तानीय कमिटी, बासिन्दा बिधायक को लेकर एक मीटिंग हुआ था की  नबीकरण के लिए पुराण प्रतिक रूप में जो बृक्ष है उसको बिना क्षति, किए सही सलामत रखते हुए नबनिर्माण कार्य सुरु होगा | जिसमे अनंत बट,गरुड़ बट और  द्वादस गोपाल बट भी शामिल है | लेकिन नब निर्माण कार्य के टाइम पहले बकुल बट को काट दिया गया, बो भी रात 10 बजे लगातार बारिस हो रहाथा , उस समय स्थानीय लोग महजूद नहीं हो पाएंगे | बिरुद्ध करनेवाला कोई नहीं होगा | ऐसा मौका देख कर काट दिया गया | फिर उसका बाद नेमल बट का भी छेदन हुआ | इसीसे मालूम पड़ता है की ये कोई भूल चूक नहीं बल्कि सोची समझी योजना है  हमारा संस्कृति , हमारा प्रतिक , हमारा आस्था को चोट पहुँचाने केलिए |  

🧨 "Navikaran" या "Vinash"?

आजकल सबकुछ "नविकरण" (renovation), "विकास", और "स्मार्ट प्रोजेक्ट्स" के नाम पर किया जा रहा है।
लेकिन प्रश्न यह है –
👉 क्या किसी राष्ट्र का विकास उसकी आत्मा को मारकर किया जा सकता है?
👉 क्या सनातन प्रतीकों को कुचलकर भारत को डिजिटल इंडिया बनाया जा सकता है?

जो लोग इतिहास, परंपरा और आध्यात्मिकता को 'रुकावट' मानते हैं, वे भारत की मूल आत्मा को पहचानने में असमर्थ हैं। 

श्राप या कृपा? अब समय है निर्णय का

जैसा कि संवाद में कहा गया:

“यह पेड़  एक कृपा है, एक आशीर्वाद है — यदि इसका अनादर किया गया तो न केवल उस व्यक्ति का, बल्कि उसकी पीढ़ियों का भी पतन निश्चित है।”

इतना शक्तिशाली और ऊर्जा से भरा स्थान यदि काटा जाए, तो केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संतुलन भी टूटता है।

 छोटा विरोध, बड़ी चुप्पी सबसे बड़ा अपराध

नेमाल में जब पवित्र वृक्ष काटा गया, तो केवल कुछ स्थानीय समिति के लोग, पुजारी और ग्रामीणों ने हल्का-सा विरोध किया। दुर्भाग्य से, इन आवाज़ों को धमकी देकर दबा दिया गया। जो कमी थी, वह जरुरत था ऐसा विरोध जो दुश्मनों के दिल में डर पैदा कर देता। इसके अभाव ने उन्हें हिम्मत दी कि वे एक के बाद एक पवित्र वृक्ष को निशाना बनाते रहें।

सच्चे संस्कृति रक्षक कहाँ हैं?

ओडिशा में अनगिनत जगन्नाथ भक्त और पंचसखा संतों के अनुयायी हैं। अच्युतानंद जी के नाम पर सेनानी समूह भी हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश उनके कार्य उनके नाम की शक्ति को साबित नहीं कर पाए। हमारी संस्कृति, हमारा धर्म और हमारी आस्था पर आज भी हमला हो रहा है, और विरोधी ताकतें अब भी मज़बूत हैं।

कमज़ोर आवाज़ क्यों?

जब कोई हमारे धर्म का विरोध करता है, तो हमें ही गलत ठहराया जाता है। सोचिए—अगर यही घटना किसी दूसरे धर्म के साथ हुई होती, तो कितने बड़े आंदोलन, रास्ता जाम, और टकराव हो जाते। लेकिन अपने मामले में हम एकजुट आवाज़ भी नहीं उठा पाते। ऐसा लगता है मानो हमारे लोग भीतर से कमज़ोर हो गए हों और बड़ी संख्या में एकजुट होने की क्षमता खो बैठे हों।

"मेरा" की ताकत

जब बात मेरे घर, मेरे मोबाइल, मेरे माँ-बाप, मेरी पत्नी, मेरे बच्चों की होती है—तो मेरा खून खौल उठता है। मैं लड़ने, बलिदान देने और जान देने तक को तैयार हो जाता हूँ। अगर कोई मेरी माँ-बाप का अपमान करे तो मैं बर्दाश्त नहीं करता। अगर कोई मेरी पत्नी या बहन को बुरी नज़र से देखे तो मैं उसकी आँख फोड़ दूँगा। अपने बेटे-बेटी के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।

"मेरा" से "हमारा" तक

लेकिन जब बात हमारे देश, हमारी संस्कृति, हमारे तीर्थस्थलों की आती है, तो हमारी ज़िम्मेदारी कम हो जाती है—क्योंकि यह सबका है, सिर्फ मेरा नहीं।
यहीं समस्या है।
जब कोई चीज़ “मेरा” होती है, तो यह निजी होती है। जब “हमारा” बन जाती है, तो लगता है यह दूसरों की भी ज़िम्मेदारी है, और जोश ठंडा पड़ जाता है।

सच्चाई यह है कि परमार्थ तब शुरू होता है जब हर व्यक्ति “हमारा” को “मेरा” समझे। जब हर इंसान को हमारी विरासत और आस्था के लिए वही लगाव और गुस्सा आए जो अपने परिवार के लिए आता है, तभी असली एकता पैदा होगी। और यह एकता असंभव को संभव बना सकती है।

एकता का आह्वान

अगर हमें अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपने पवित्र स्थलों की रक्षा करनी है, तो हमें सोच बदलनी होगी।
हमें “हमारा” के लिए वही जुनून पैदा करना होगा जो “मेरा” के लिए होता है। तभी हम एकजुट होकर खड़े हो पाएँगे, लड़ पाएँगे और जो हमारा है, उसकी रक्षा कर पाएँगे।

हो सकता है की हमारा अंदर कोई ऐसी धर्म द्रोही , देश द्रोही है जो लोभ में आकर पैसा की लालच में  हमारा बिरोधिओं का साथ मिलकर ऐसा काम कर रहाहे | उसको प्रचुर मात्रा में फंड्स मिलता होगा हमारा बिरुद्ध ऐसे जासूसी करने के लिए | इतिहास सखि है बाहरी सत्रु से मिलकर हिन्दुओ ने हिंदुओं को  हराया है दुस  रा कोई नहीं | इसी के बारे में बराबर तदन्त होना चाहिए और उस देश द्रोहिओं को धर्म द्रोहिओं को पकड़ के कड़े से कड़े सजा होना चाहिए 

सबसे दुःखद बात यह है कि स्थानीय स्तर पर कोई विरोध नहीं हुआ। लोग चुप रहे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। यह चुप्पी ही कारण है कि आज हम इतना बड़ा नुक़सान देख रहे हैं।

“अगर समय पर चुप्पी तोड़ दी जाती, तो शायद यह घटना नहीं होती।”

हमें समझना होगा कि धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए खड़े होना पड़ता है। पीछे से बोलने से कुछ नहीं होगा — अब सामने आकर बोलने का समय है।

यह कोई होटल नहीं, महापुरुषों का पीठ था

नेमाल का यह स्थान कोई पांच सितारा होटल नहीं था। यह महापुरुष अच्युतानंद जी की तपोभूमि थी। एक उपासना स्थल, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं — केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि अनुभूति के लिए।

स्नान पूर्णिमा के दिन, इस वर्ष लगभग 12-15 लाख लोग वहां पहुंचे, भारत ही नहीं, बल्कि 47 देशों से श्रद्धालु आए — बटवृक्ष और बकुलवृक्ष के दर्शन के लिए। अब जब वृक्ष ही नहीं रहा, तो दर्शन किसका करेंगे?


परिणाम: जो दिखता नहीं, वह भी भुगतना पड़ेगा

कहा जाता है कि नेमा बट के आसपास नवीकरण में लगे जिन लोगों ने इस पवित्र स्थल के साथ छेड़छाड़ की, उनके साथ और उनके परिवारों के साथ अनहोनी घटनाएं घटीं — जिनका उल्लेख लोग खुलेआम करने से भी डरते हैं।

यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता। यह उस अदृश्य ऊर्जा की प्रतिक्रिया हो सकती है, जो वर्षों से इस वृक्ष में संचित थी।

"नेमा बट को काटना, आत्मा की जड़ों को काटने जैसा है।"

प्रलय का संकेत?

मालिका ग्रंथों में स्पष्ट है — जब बटवृक्ष कटेगा, तब प्रलय समीप होगा। यह संयोग नहीं कि बटवृक्ष कटते ही देशभर में आपदाएँ, सामाजिक अशांति, और प्राकृतिक असंतुलन तेजी से बढ़ रहे हैं।

“यह अशुभ समय है। और यह घटना, अशुभ समय की अशुभ घटना है।” 


🙏 जनता की अपीलअब क्या किया जाए?

जो हो गया, वह अत्यंत दुःखद है। लेकिन हम अभी भी अपने भीतर की आस्था से, प्रार्थना से, और समर्पण से कुछ बचा सकते हैं। 

संदेश स्पष्ट है:

“महापुरुषों को हृदय से प्रेम करो। प्रार्थना करो। जीवन सार्थक होगा। जो गलत करेगा, उसे दंड अवश्य मिलेगा। लेकिन जो भक्ति करेगा, वह कृपा का पात्र बनेगा।”

आज हम एक संक्रमण काल में खड़े हैं।
क्या हम अपनी शेष धर्म-संस्कृति को भी "विकास" के नाम पर मिटने देंगे?
या फिर हम धार्मिक आत्मगौरव के साथ खड़े होंगे और शेष धरोहरों की रक्षा करेंगे?

नेमा बट को अब प्रतिकार का प्रतीक बनाना होगा।
हमें यह स्पष्ट करना होगा कि सनातन संस्कृति के साथ कोई भी खिलवाड़ स्वीकार नहीं
हमें इस घटना का दस्तावेज़ीकरण करना होगा।
हमें अपनी अगली पीढ़ी को यह बताना होगा कि कैसे एक पवित्र वृक्ष के विनाश ने पूरे समाज को झकझोर दिया।

हमारी मांग है कि:

  • Nema Bata स्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए।

  • उस वृक्ष की स्मृति में एक जीवंत संग्रहालय/आध्यात्मिक केंद्र बनाया जाए।

  • घटना की जांच हो और जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए।

  • भविष्य में कोई भी धार्मिक/संस्कृतिक प्रतीक इस प्रकार कट न पाए – इसके लिए कानूनी सुरक्षा दी जाए।


🔚 निष्कर्ष: यह वृक्ष नहीं, यह पहचान थी

यह सिर्फ एक पेड़ नहीं था। यह हमारी पहचान, परंपरा, भविष्यवाणी और आत्मा से जुड़ा हुआ था। नेमाल का वृक्ष अब नहीं रहा। लेकिन उसका संदेश, उसकी चेतावनी, और उसकी शक्ति आज भी जीवित है — हमारे भीतर।

दुनिया को यह जानना चाहिए —
नेमा बट वृक्ष को काट दिया गया है, लेकिन सनातन धर्म की आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता।
हम बोलेंगे, याद रखेंगे और पुनर्निर्माण करेंगे —ईंट और पत्थर से नहीं, बल्कि चेतना से। यह समय है जागने कासंघर्ष करने का, और धर्म की रक्षा का।

"नेमा बट वृक्ष" को काटना – क्या यह भारत की संस्कृति पर सुनियोजित प्रहार है?""जब वटवृक्ष गिरता है, तो सिर्फ छाया नहीं जाती – उसकी जड़ें भी साथ जाती हैं।"

अगर हम अभी नहीं जागे, तो अगली बार शायद किसी संत की समाधि, किसी मंदिर की नींव, या किसी परंपरा का स्तंभ मिटा दिया जाएगा।

Nema Bata को बचाया नहीं जा सका, लेकिन उसकी चेतावनी को अनसुना न करें।
यह हमारे लिए एक सांस्कृतिक युद्ध का बिगुल है।  जय सनातन। जय भारत। जय जगन्नाथ। जय पंचसखा। जय श्री अच्युत।

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